जन्माष्टमी पर्व | Kadak Mithi

जन्माष्टमी पर्व : सिन नंबर १ 
चार-पाँच दिन छूट्टीयां आ रही है बोस, दो दिन ज्यादा छूट्टी ले ले, तो पूरा हफ्ता छूट्टीयों का मिल जाएगा, पूरा साल बैल कि तरहा यहाँ से वहाँ भाग-दौड ही करी है…  चल धूमने चलते हैं । मज़ा आ जाएगा… अरे छोड यार, हॉटेल का बंदोबस्त हो जाएगा, ना भी हुआ तो मेरे एक दोस्त का घर बंध ही पडा है, वहाँ ठहर जाएँगे… और देख, वहाँ “कुछ” मिलेगा नही, यहाँ से ही अरेन्ज कर के जाना पडेगा… समज गया ना ! दो-चार तु ले ले, मैं भी अपने सप्लायर को अभी के अभी बोल देता हुँ… देखना चालु ब्रान्ड न आ जाए… यार, छूट्टीयां मिली है तो… नंद घर आनंद भयो… जय कनैयालाल कि…

जन्माष्टमी पर्व : सिन नंबर २
आज रात से ही शुरु यार, अब तो जन्माष्टमी आ गई… तेरे घर या मेरे घर ? बोल, कितने बजे ? कार्ड्ज़ ? ना ना यार, लास्ट टाईमवाला कैट नही चाहीए, एकदम बकवास था, अनलक्की भी था यार, एक भी बाज़ी नही आई । देख अपने पास एक मस्त ईम्पोर्टैड प्लास्टिक वाले कार्ड्ज़ आए हैं, मैं ले आउंगा । कल रात को ऎसे ही ट्रायल कि बाज़ी लगा रहा था उसमे भी साले ट्रायो आ रहे थे… एकदम लक्की है । लास्ट जन्माष्टमी में जो भी हारा हुँ उसे भरपाई तो करुंगा ही, उपर से बिवी-बच्चों के लिए आने वाली दिवाली की कुछ शॉपींग भी करनी है… वो भी कमा लेना है । तु खाने-पिने का इंतज़ाम कर ले यार… बाकी का तामज़ाम मैं देख लुंगा । चल… मिलते हैं… नंद घर आनंद भयो… जय कनैयालाल कि…

जन्माष्टमी पर्व : सिन नंबर ३
सुनो… जन्माष्टमी आ रही है । लाला का जन्मोत्सव धामधूम से मनाना है । हो सके तो कंपनी से थोडा एड्वान्स ले लेना । लाला के लिए नए वस्त्र, श्रृंगार के लिए भी कुछ सामान लेना है, भोग भी धराना होगा, मिठाई-प्रसाद-असली घी का भी खर्चा है, ध्यान में रखना । छोटु कि स्कूल फिस भी भरनी है, लेकिन मैं स्कूल वालों से बात कर लुंगी, एक दो महिना टाल भी दुंगी… अरे… वो तो अपने लिए बुक्स-कॉपीयाँ भी मांग रहा था, मुश्किल से उसे समज़ाया है कि अगले महिने ले आएंगे… एकाध महिना छोटु को स्कूल के नाश्ते में कुरमुरे देंगे, देखो आप भी अपना ये घूमना फिरना, यार-दोस्तो के साथ चाय-नाश्ता जरा रोक के रखना । बस, इस महिने मेरे लाला का एकदम बढ़ीया श्रृंगार, भोग कर लें ! नंद घर आनंद भयो… जय कनैयालाल कि…

जन्माष्टमी पर्व : सिन नंबर ४
ए मन्या… देख… कोई घर छूटने न पाए, सब को हिला हिला कर चंदा वसूल कर । और तु… अपने एरिआ में निकल बे… एक एक दुकान वाला – कौन ना बोलता है, मेरे को बोल… साला पूरे साल मे सिरफ एक बार दोसो-पाँचसौ देने मे काहे का मचमच करते हैं साले…! देख, अपुन को पूरा रसिद-हिसाब मंगता है, पीछु से अपुन को कोइ लफड़ा नही मंगता है । और सुन बे छनिया, रोड पे, हर एक नाके पे तेरे भाइलोग को ले कर खडा हो जाने का, बोले तो एकदम नाकाबंदी… एक भी आने जाने वाला छूटा तो तेरा भी कनैक्शन तूटा… इस बार ऎसा जक्कास तामजाम करना है, बाजु कि सोसायटी वाला गणपतभाई (अरे भाई काहे का साला… लल्लु है लल्लु) वो गणपत्या “बीप…बीप…बीप” हो जाएगा… बोस.. ए..ए..ए..ए.. मन्या, तु अभी तक इधर ही खडेला है खंभे कि तरहा… निकलता है अपने काम पे या मैं निकालुं ? शाम तक मेरे को तगडा धंधा चाहिए… दिमाग घूम रहेला है, साला इसको खंभे कि जैसे खडा देख कर अपुन को अपना खंभा याद आ गया… ए छोकरे, खंभा ला… बहोत काम है रे बाबा… नंद घर आनंद भयो… जय कनैयालाल कि…
आज जन्माष्टमी पर्व… हमें अपनी संस्कृति पर कहेलाने वाला गर्व है । पूरे सावन मास में भगवान शंकर को दूध से नहला नहला कर पूरे साल का दूध बर्बाद करने के बाद, अब आज कृष्णजन्मोत्सव भी मनाना है ।
बस, इन देवों का सिज़न खत्म होते ही गणपतीजी कि बारी आएगी… फिर आएगी नवरात्री… जय माताजी… धर्म-आस्था-भक्ति का पूरे साल का क्वॉटा इन दो महिनों मे पूरा कर लो… अगले साल फिर मिलेंगे…
नंद घर आनंद भयो… जय कनैयालाल कि…

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